राजस्थान में जाट समाज दलित समुदाय के बाद दूसरी सबसे बड़ी कोम हैं। यह हिस्सा राजस्थान की राजनीति में अहम हिस्सा रखता हैं। राजस्थान के मारवाड़ के नागौर, बाड़मेर, जोधपुर और बीकानेर में जाट सबसे ज्यादा है। इसके बाद शेखावाटी के सीकर, झुंझुनूं और चुरू में जाटों की संख्या अच्छी हैं। इसके अलावा गंगानगर, भरतपुर और धौलपुर जिले में भी जाटों का डंका बजता हैं। इस तरह राजस्थान की कुल 200 विधानसभा सीटों में से 80 सीटों पर जाटों का प्रभाव हैं। राजस्थान में अब तक 14 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और आज 15 वी विधानसभा के चुनाव होने जा रहें हैं, लेकिन राजस्थान में अभी तक एक भी जाट मुख्यमंत्री नहीं बना। राजस्थान में लगभग सभी जातियों से मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन यह कौम अभी मुख्यमंत्री का सपना देख रही हैं। आज हम इसी विषय पर चर्चा करने वाले हैं।
उसके बाद कांग्रेस ने राजस्थान के किसानों को उनकी जमीन वापिस दिला दी, जो राजपूत राजाओं के पास थी। सरकार ने ऑर्डर दिया कि जो जिस जमीन पर खेती करता, वो जमीन उसी की हो जाएगी। इस फैंसलें के बाद राजस्थान के किसानों को उनकी जमीन मिल गई। किसानों में सबसे ज्यादा जाट समुदाय ही था। इसके बाद जाट समाज कांग्रेस को ही वोट करने लग गया। जाट वोटर कांग्रेस का परमानेंट वोट बैंक बन गया। बलदेव राम मिर्धा के बाद जाट नेताओं में नाथूराम मिर्धा और रामनिवास मिर्धा का नाम आगे आया और नाथूराम मिर्धा जाटों के और किसानों के सबसे बड़े नेता बन गए। इन दशकों में कई जाट नेता चुनाव जीते, लेकिन कभी सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंचे।
मिर्धा परिवार के बाद जोधपुर का मदेरणा परिवार भी राजनीति में आ गया हैं। मदरेणा परिवार के परसराम मदरेणा जाटों के कदावर नेता बनकर उभरे। साल 1998 के चुनावों में कांग्रेस ने परसराम मदरेणा को जाट मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके चुनाव लड़ा। जाटों के सहयोग से कांग्रेस ने राजस्थान में एक अच्छी जीत दर्ज की और बहुमत वाली सरकार कांग्रेस बना सकती थी। किए हुए वादें के मुताबिक कांग्रेस ने मदरेणा को मुख्यमंत्री नहीं बनाकर नए चेहरे अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया। क्योंकि गहलोत ने चुनाव पूरे होने के बाद खुद को भी सीएम का दावेदार बताया और सोनिया गांधी से मिलकर वोटिंग कराने की बात कही। चुनाव के बाद गहलोत और मदेरणा के बीच वोटिंग हुई। जिसमें अशोक गहलोत को तीन विधायकों के वोट ज्यादा मिले, इसलिए गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए। एक तरह से परसराम मदरेणा के साथ धोखा हुआ और जाटों को यह रास नहीं आया। उस समय जाट कांग्रेस ने नाराज हो गए।
साल 2003 के चुनावों में बीजेपी ने एक नई चाल चली। बीजेपी कांग्रेस के जाट वोट बैंक को अपने साथ लेना चाहती थी। इसलिये बीजेपी ने वसुंधरा राजे को 2003 के चुनावों में मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। वसुंधरा ने कहा कि मैं जाटों की बहू हूँ, आप मुझे वोट दे और मै जाट मुख्यमंत्री बनुगी। वसुंधरा ने राजपूतों से कहा कि मैं राजपूतों की बेटी हूँ और गुर्जरों से कहा कि मैं गुर्जरों की सम्बन्धन हूँ। इस भाषण के बाद राजस्थान की जनता ने बीजेपी को वोट दिया। पहली बार बीजेपी ने राजस्थान में 120 सीट वाली बहुमत की सरकार बना ली। उस समय जाट समुदाय खुश हुआ कि हमने कांग्रेस को हरा दिया।
अब इन 5 सालों में परसराम मदरेणा के बेटे महिपाल मदेरणा और झुंझुनूं के शीशराम ओला जाटों के कदावर नेता बनकर सामने आए। जैसे ही अगले चुनाव 2008 में हुए तो शीशराम ओला के मुख्यमंत्री बनने की मांग उठने लगी। चुनाव कांग्रेस जीत गई। इस बार सियासी जादूगर अशोक गहलोत ने फिर से बाजी मार ली। इसी कार्यकाल में भंवरी देवी हत्याकांड हो गया, अशोक गहलोत ने सीबीआई जांच करवाकर महिपाल मदेरणा को जेल तक पहुंचा दिया। इधर शीशराम ओला और परसराम मदरेणा का निधन हो गया। अगले चुनावों में मोदी लहर आ गई। राजस्थान में जाट फिर से कांग्रेस से नाराज चल रहें थे। फिर से बीजेपी ने 163 सीटें जीती और कांग्रेस महज 21 सीटों पर सिमट गई। राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री का सपना फिर से अधूरा ही रह गया।
यह नहीं हैं कि राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री की मांग कभी नहीं उठी हो, मांग उठी थी। लेकिन अभी तक पूरी नहीं हुई हैं। राजस्थान में जाट नेताओं की बात करते हैं, तो सबसे पहले मिर्धा परिवार का नाम सामने आता हैं। नागौर जिला जाटों की राजनीति का गढ़ माना जाता हैं। जाटों में सबसे पहले नेता किसान केसरी बलदेव राम मिर्धा हुए थे। 50 के दशक में मिर्धा ने मारवाड़ किसान सभा का गठन किया था। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मिर्धा को मनाकर अपनी पार्टी कांग्रेस में मारवाड़ किसान सभा को मिला लिया।
उसके बाद कांग्रेस ने राजस्थान के किसानों को उनकी जमीन वापिस दिला दी, जो राजपूत राजाओं के पास थी। सरकार ने ऑर्डर दिया कि जो जिस जमीन पर खेती करता, वो जमीन उसी की हो जाएगी। इस फैंसलें के बाद राजस्थान के किसानों को उनकी जमीन मिल गई। किसानों में सबसे ज्यादा जाट समुदाय ही था। इसके बाद जाट समाज कांग्रेस को ही वोट करने लग गया। जाट वोटर कांग्रेस का परमानेंट वोट बैंक बन गया। बलदेव राम मिर्धा के बाद जाट नेताओं में नाथूराम मिर्धा और रामनिवास मिर्धा का नाम आगे आया और नाथूराम मिर्धा जाटों के और किसानों के सबसे बड़े नेता बन गए। इन दशकों में कई जाट नेता चुनाव जीते, लेकिन कभी सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंचे।
मिर्धा परिवार के बाद जोधपुर का मदेरणा परिवार भी राजनीति में आ गया हैं। मदरेणा परिवार के परसराम मदरेणा जाटों के कदावर नेता बनकर उभरे। साल 1998 के चुनावों में कांग्रेस ने परसराम मदरेणा को जाट मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके चुनाव लड़ा। जाटों के सहयोग से कांग्रेस ने राजस्थान में एक अच्छी जीत दर्ज की और बहुमत वाली सरकार कांग्रेस बना सकती थी। किए हुए वादें के मुताबिक कांग्रेस ने मदरेणा को मुख्यमंत्री नहीं बनाकर नए चेहरे अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया। क्योंकि गहलोत ने चुनाव पूरे होने के बाद खुद को भी सीएम का दावेदार बताया और सोनिया गांधी से मिलकर वोटिंग कराने की बात कही। चुनाव के बाद गहलोत और मदेरणा के बीच वोटिंग हुई। जिसमें अशोक गहलोत को तीन विधायकों के वोट ज्यादा मिले, इसलिए गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए। एक तरह से परसराम मदरेणा के साथ धोखा हुआ और जाटों को यह रास नहीं आया। उस समय जाट कांग्रेस ने नाराज हो गए।
साल 2003 के चुनावों में बीजेपी ने एक नई चाल चली। बीजेपी कांग्रेस के जाट वोट बैंक को अपने साथ लेना चाहती थी। इसलिये बीजेपी ने वसुंधरा राजे को 2003 के चुनावों में मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। वसुंधरा ने कहा कि मैं जाटों की बहू हूँ, आप मुझे वोट दे और मै जाट मुख्यमंत्री बनुगी। वसुंधरा ने राजपूतों से कहा कि मैं राजपूतों की बेटी हूँ और गुर्जरों से कहा कि मैं गुर्जरों की सम्बन्धन हूँ। इस भाषण के बाद राजस्थान की जनता ने बीजेपी को वोट दिया। पहली बार बीजेपी ने राजस्थान में 120 सीट वाली बहुमत की सरकार बना ली। उस समय जाट समुदाय खुश हुआ कि हमने कांग्रेस को हरा दिया।
अब इन 5 सालों में परसराम मदरेणा के बेटे महिपाल मदेरणा और झुंझुनूं के शीशराम ओला जाटों के कदावर नेता बनकर सामने आए। जैसे ही अगले चुनाव 2008 में हुए तो शीशराम ओला के मुख्यमंत्री बनने की मांग उठने लगी। चुनाव कांग्रेस जीत गई। इस बार सियासी जादूगर अशोक गहलोत ने फिर से बाजी मार ली। इसी कार्यकाल में भंवरी देवी हत्याकांड हो गया, अशोक गहलोत ने सीबीआई जांच करवाकर महिपाल मदेरणा को जेल तक पहुंचा दिया। इधर शीशराम ओला और परसराम मदरेणा का निधन हो गया। अगले चुनावों में मोदी लहर आ गई। राजस्थान में जाट फिर से कांग्रेस से नाराज चल रहें थे। फिर से बीजेपी ने 163 सीटें जीती और कांग्रेस महज 21 सीटों पर सिमट गई। राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री का सपना फिर से अधूरा ही रह गया।
2013 से 2018 तक जाटों में एक नया नेता उभर कर आया- हनुमान बेनीवाल। बेनीवाल ने किसानों के लिए इन 5 सालों में खूब लड़ाई लड़ी और किसान मुख्यमंत्री की भी मांग उठाई। अब बेनीवाल ने चुनाव से सिर्फ एक महीने पहले अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन कर लिया। अब आज चुनाव होने जा रहे हैं। 11 दिसम्बर को चुनावों का परिणाम आएगा। लेकिन जाट मुख्यमंत्री अब इस चुनाव ने बनेगा यह कहना बहुत ज्यादा मुश्किल होगा। जाटों के लिए जाट मुख्यमंत्री अब एक सपना बन कर रह गया हैं।
अभी कांग्रेस में जाट नेताओं में रामेश्वर डूडी हैं, जो राजस्थान विधानसभा प्रतिपक्ष नेता थे। डूडी नोखा से चुनाव लड़ते हैं। बीजेपी में कोई बड़े कद का जाट नेता नहीं हैं। दूसरी ओर हनुमान बेनीवाल अभी सबसे बड़े जाट समाज के नेता हैं। लेकिन इनमें कोई भी सीएम की कुर्सी के पास नहीं हैं। बेनीवाल सिर्फ 57 सीटों पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। हमने इस रिपोर्ट पर एक video भी बनाया हैं, आप उस video को देखकर भी अच्छी तरह समझ सकते हैं। नीचे की लिंक खोलकर video देखें।








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