BJP के लिए राजस्थान की राह आसान नहीं! वसुंधरा-गहलोत की दोस्ती को तोड़ना मुश्किल

Faris Khan
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कोरोना संकट के बीच राजस्थान का सियासी घमासान शांत होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। सचिन पायलट के बागी तेवर के बाद ऐसा लग रहा था कि अशोक गहलोत की कुर्सी अब संकट में आ गई है। लेकिन जिस प्रकार से गहलोत ने अपने राजनीतिक अनुभव का फायदा उठाते हुए पारी को संभाली है। उससे एक बात तो स्पष्ट है कि राजस्थान का राजनीतिक खेल गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से अलग होने वाला है।



अशोक गहलोत ने संभाला मोर्चा

बगावत के बाद मध्यप्रदेश से सबक लेते हुए अशोक गहलोत की सलाह पर पार्टी ने पायलट को सरकार और संगठन दोनों से बाहर कर दिया। कांग्रेस से पद व प्रतिष्ठा गंवाने के बाद सचिन पायलट ने कहा कि वो बीजेपी में कभी शामिल नहीं होंगे। पायलट के इस बयान के बाद कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता एक बार फिर से सचिन को मनाने के लिए सक्रिय हो गए। लेकिन उनकी यह भी कोशिश नाकाम साबित हुई। वहीं दूसरी ओर पायलट गुट के विधायकों को स्पीकर से मिले नोटिस का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया।



बीजेपी सक्रिय होने में असमर्थ


वहीं दूसरी ओर बीजेपी इस पूरे मामले में सक्रिय होना चाहती है लेकिन पार्टी के अंदर की गुटबाजी उन्हें ऐसा करने से रोक रही है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच अनबन की गाथा समूचे प्रदेश को पता है। साथ ही सीएम अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे की दोस्ती भी किसी से छुपी नहीं है। यही कारण है कि अभी राजस्थान में बीजेपी की ओर से केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत फ्रंट फूट पर नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर यह भी सच है कि गजेंद्र सिंह शेखावत को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करना बहुत मुश्किल है। इसीलिए वसुंधरा राजे अभी वेट एंड वॉच की स्थिति में है।



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