देश का अन्नदाता कहे जाने वाले और रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले किसान इन दिनों बेबस और लाचार हैं, क्योंकि उन पर इन दिनों तिहरी मार पड़ रही हैं, चाहे यह मार प्रकृति की ओर से या फिर सरकार की ओर से। सबसे पहले किसानों को कोरोना ने बर्बाद किया, क्योंकि कोरोना के कारण सब कुछ बन्द हो गया, जिससे किसानों की फसलें नहीं बिक पाई, किसानों की सब्जियां खेतों में पड़ी-पड़ी सड़ गई, लेकिन किसानों की सब्जियां नहीं बिकी। किसान इस समस्या से मुश्किल से उभरने की कोशिश कर ही रहे थे कि किसानों पर एक और नई समस्या आ गई।
यह दूसरी समस्या थी- टिड्डियाँ। दुश्मन देश पाकिस्तान से राजस्थान के रास्ते आ रही टिड्डियाँ ने फिर किसानो की बची हुई कमर को तोड़ा। किसानों ने पुरानी बातें भूल खरीफ की फसलें खेतो में बोई ही थी, अभी बाजरे जैसी फसलें कुछ इंच तक ऊंची आई ही थी कि टिड्डियाँ आ गई और उस फसल पर बैठ गई, जहां-जहां टिड्डियाँ बैठी, वहां किसानों के हाथ सिर्फ बेबसी और लाचारी ही हाथ आई। अभी तक न कोरोना का खतरा टला हैं और न ही टिड्डियों का। आने वाले पूरे साल ऐसा लग रहा हैं कि यह दोनों समस्या जिंदा रहेगी।
इन दो समस्या के अलावा तीसरी समस्या आ गई- डीजल की। यह समस्या सरकार के द्वारा बनाई हुई थी। क्योंकि सरकार के भारी भरकम टैक्स के कारण आज डीजल पेट्रोल से आगे दौड़ने की कोशिश में हैं। किसानों को पेट्रोल से कोई खास नहीं फर्क पड़ता, क्योंकि उनका पूरा काम डीजल से ही होता हैं। किसान की अर्थव्यवस्था तो पिछले 3 महीने से बिगड़ी हुई थी, इसमें डीजल के दामों में चार चांद लगा दिए। किसान का ट्रेक्टर डीजल से चलता, किसान का जनरेटर डीजल से चलता हैं, उसकी सब्जियां डीजल से बाजार पहुंचती हैं, इसलिए उसके लिए किराया भाड़ा भी बढ़ गया। किसान इस समय अपने खेतों में बुवाई का काम कर रहा हैं, ऐसे में डीजल का दाम बढ़ना किसान के लिए बहुत ही ज्यादा चिंताजनक हैं।
इस तरह किसान पर इस बार तिहरी मार पड़ रही हैं, हालांकि अभी अनुमान के हिसाब से मानसून किसानों के साथ दिखाई दे सकता हैं, अगर इस मानसून ने भी किसानों के साथ धोखा कर दिया तो किसानों की हालत खस्ता हो जाएगी।

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