भारत पाकिस्तान ने एक दूसरे को दी परमाणु हथियारों की लिस्ट

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 भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण रिश्तों के बावजूद, एक ऐसी डिप्लोमैटिक प्रक्रिया लगातार जारी है जो दोनों परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के बीच भरोसा, पारदर्शिता और संयम को बढ़ावा देती है। 1 जनवरी 2026 को दोनों देशों ने अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की सूची एक दूसरे को सौंपने की परंपरा निभाई, जो हर साल इसी दिन होती है। यह प्रक्रिया अब लगभग 35 साल से लगातार जारी है, बेतरह के राजनीतिक या सैन्य तनाव को झेलते हुए भी यह अभ्यास रुका नहीं है। �



क्या है यह सूची और क्यों होती है आदान-प्रदान?

भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु हथियारों वाले देश हैं। ऐसे संवेदनशील और खतरनाक अस्त्रों के साथ, किसी भी मिसअंडरस्टैंडिंग का परिणाम विनाशकारी हो सकता है। इसी को ध्यान में रखकर दोनों देशों ने 1988 के अंत में एक खास समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे औपचारिक रूप से परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमला निषेध समझौता कहा जाता है। इस समझौते के मुताबिक, दोनों देशों को हर कैलेंडर वर्ष की 1 जनवरी को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों, संस्थानों और उनसे जुड़ी सुविधाओं की पूरी सूची एक दूसरे को साझा करनी होती है। �

यह सूची वह जगहें, सुविधाएं और प्रतिष्ठान शामिल करती हैं जो किसी भी तरफ से हमला न होने वाले हैं और जिनके खिलाफ कोई भी सैन्य कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। इस आदान-प्रदान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तनाव, युद्ध जैसे हालात में भी इन प्रतिष्ठानों पर किसी भी तरह का हमला न हो। इसके अलावा यह कदम आपसी विश्वास और रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है। �

समझौते का इतिहास और ज़रूरी प्रावधान

यह साझेदारी 1988 में उस समय शुरू हुई जब दोनों देशों ने ठंडे युद्ध के बीच और बढ़ते भौतिक तनाव को देखते हुए इस गंभीर मुद्दे पर विचार किया। उस समय दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने मिलकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत:

🔹 दोनों देशों को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची हर वर्ष 1 जनवरी को साझा करनी है।

🔹 सूची में शामिल प्रतिष्ठान उन जगहों को दर्शाते हैं जहां परमाणु ऊर्जा, परीक्षण, निर्माण या भंडारण से जुड़ी गतिविधियाँ होती हैं।

🔹 यह समझौता 27 जनवरी 1991 से लागू हुआ और पहली सूची का आदान-प्रदान 1 जनवरी 1992 को हुआ। �

यह समझौता न तो रोकता है कि दोनों देश परमाणु हथियार विकसित ना करें, और न ही यह हथियारों की संख्या घटाने का कोई उपाय है। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से एटमी प्रतिष्ठानों पर हमला न होने देना और भरोसा कायम रखना है। यानी यह समझौता परमाणु आयुधों को दबाने के बजाय उनके सुरक्षित उपयोग और नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। �

इस साल का आदान-प्रदान और क्या खास रहा?

1 जनवरी 2026 को दोनों देशों ने अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की सूची एक-साथ साझा किया। यह क्रम लगातार 35वां आदान-प्रदान रहा। इस बार भी दोनों देशों के बीच राजनयिक चैनलों के जरिए लिस्ट साझा की गई। विदेश मंत्रालयों ने आधिकारिक बयान जारी किया कि यह प्रक्रिया समझौते के दायरे में है जिसमे दोनों पक्ष शामिल प्रतिष्ठानों का विवरण एक दूसरे को दे रहे हैं। �

रोचक बात यह है कि यह वार्षिक प्रक्रिया तब भी जारी रखी जाती है जब दो देशों के बीच सीमा विवाद, आतंकवाद, सैन्य तनाव या राजनीतिक मतभेद चरम पर होते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि यह कदम एक स्थिरता-संदेश देता है कि भले ही विविध मुद्दों पर मतभेद हो, परमाणु प्रतिष्ठानों को लेकर कोई अप्रत्याशित कार्रवाई नहीं होगी। �

क्या यह प्रक्रिया केवल परमाणु प्रतिष्ठानों तक सीमित है?

हालाँकि यह समझौता विशेष रूप से परमाणु प्रतिष्ठानों पर केंद्रित है, इसके अलावा दोनों देशों के बीच कुछ और सम्मानित परंपराएँ भी हैं:

➡️ कैदियों, मछुआरों या नागरिकों की सूची साझा करना: भारत और पाकिस्तान अपने-अपने विवादित मामलों में कैदियों या दो देशों के नागरिकों की सूची को भी साझा करते हैं ताकि मानवीय आधार पर उनकी रिहाई, स्थानांतरण या सहूलियतें सुनिश्चित की जा सकें। यह प्रक्रिया भी एक विशिष्ट समझौते के तहत होती है और जनवरी तथा जुलाई में की जाती है। �

विशेषज्ञों की क्या राय है?

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक, यह विवेकपूर्ण कदम दोनों देशों के बीच कम्युनिकेशन और पारदर्शिता को मजबूत करता है। भले ही यह समझौता परमाणु हथियारों के नियंत्रण या उन्हें हटाने के बारे में नहीं है, पर यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी मिसगाइड या नियोजित हमले से पहले पूरी सूची मौजूद रहती है, जिससे रणनीतिक गलतफहमियाँ कम होती हैं। �

विशेष रूप से यह देखा गया है कि इस सूची का आदान-प्रदान कोई प्रतिबंधित या अत्यधिक संवेदनशील जानकारी साझा नहीं करता, बल्कि यह जानकारी कि कौन-सी प्रतिष्ठान पर हमला नहीं होना चाहिए, ताकि किसी भी बड़े युद्ध-स्तर पर दुष्परिणाम न हो। �

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