भारतीय के गौरवशाली इतिहास में राजस्थान का अपना एक अलग महत्व रहा है। राजस्थान की धरती ने देश को कई रणबांकुरें, योद्धा और वीर दिए जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना देश की स्वाधीनता की रक्षा अंतिम सांस तक की। आज संपूर्ण भारत इन वीरों के बलिदान को याद कर गर्व महसूस करता है। इन वीरों में वीरभूमि मेवाड़ का अपना एक अलग स्थान है जहां बप्पा रावल, खुमाण प्रथम महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, उदयसिंह और महाराणा प्रताप, महाराजा सूरजमल जैसे वीरों ने जन्म लिया।
मेवाड़ के महान राजपूत राजा महाराणा प्रताप का नाम पराक्रम और शौर्य की मिसाल के तौर पर पूरी दुनिया में लिया जाता है। मुगल शासकों की दासता को नकारने वाले इस राजपूत सम्राट ने सबकुछ त्याग कर अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया। सीमित संसाधनों और अभाव की जिंदगी जीने वाले महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ और 29 जनवरी 1597 को उनकी मौत हुई, आइए मेवाड़ के इस महान राजा की पुण्यतिथि पर जानते हैं इनके बारे में।
महाराणा प्रताप का बचपन का नाम कीका था, प्रताप ने कुल 11 शादियां की जिससे उनको 17 बेटे और 5 बेटियां हुई।
चेतक घोड़े से था बेहद लगाव
महाराणा प्रताप के बहादुरी के हर किस्से में उनके घोड़े चेतक का नाम जरूर आता है। ऐसी किवदंतियां हैं कि युद्ध में मुगल सेना के पीछे पड़ने पर चेतक ने राणा को अपनी पीठ पर बैठाकर हजारों फीट लंबे नाले को पार करवाया था। आज भी हल्दी घाटी में राणा की समाधि के पास ही चेतक की समाधि बनी हुई है। कहा जाता है कि महाराणा प्रताप युद्ध में जो भाला उठाते थे वो 81 किलो का था और वो अपनी छाती पर 72 किलो का कवच पहनते थे।
हल्दीघाटी के युद्ध में आखिरी सांस तक नहीं मानी हार
मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हुए हल्दीघाटी के युद्ध को आज तक कोई नहीं भूला है। हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून, 1576 ई. को हुआ था। हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में ऐसा कहा जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीता था और न ही राणा हारे थे।
हल्दी घाटी के युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप की सेना में 20000 सैनिक थे और अकबर की सेना में 85000 सैनिक थे। सैनिकों की कमी के बावजूद भी राणा ने आखिरी सांस तक हार नहीं स्वीकार की।



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