बसों में टिकट काटने वाले कैलाश चौधरी कैसे बन गए देश के कृषि मंत्री, जाने उनके संघर्ष की कहानी

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बाड़मेर, राजस्थान।

एक समय था जब कैलाश चौधरी बस में टिकट काटने का काम करते थे, एक समय यह भी आ गया कि वो भारत गणराज्य के कृषि मंत्री हैं। एक समय था कि जब कैलाश खुद खेती का काम करते थे, लेकिन अब वो देश के कृषि मंत्री हैं। हम बात कर रहे हैं बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट से सांसद और हाल ही में मोदी कैबिनेट में शामिल हुए कैलाश चौधरी की। कैलाश चौधरी को राजनीति विरासत में भी नहीं मिली हैं, मतलब उनके परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं हैं। कैलाश चौधरी की जिंदगी में काफी संघर्ष हैं, तो उनकी जिंदगी सबसे ज्यादा चौकानें वाली हैं। चौधरी ने हर बार सबको चौंका ही दिया।

प्रारम्भिक जीवन- 

कैलाश चौधरी का जन्म 20 सितंबर 1973 में राजस्थान के बाड़मेर जिले की बायतु तहसील के गांव कोसरिया में हुआ था। उनका जन्म जाट समाज मे हुआ, उनके पिता का नाम तगाराम हैं, तो उनकी माता का नाम स्वर्गीय चुकी देवी हैं। परिवार कृषि का कार्य करता था। कैलाश चौधरी ने अजमेर की एमडीएस यूनिवर्सिटी से एमए तक की पढ़ाई की। उसके अलावा नागपुर विश्वविद्यालय से बीपीएड की डीग्री भी ली।

कैलाश चौधरी ने शुरुआत में राजनीति में आने की सोची, लेकिन जब उनको इसमें पहचान नहीं मिली तो उन्होंने अपने घर-परिवार के लिए बस कंडक्टर का काम किया। बस कंडक्टर का काम करते-करते कैलाश चौधरी राजनीति से भी जुड़ने लगे।

राजनीतिक जीवन-

बस कंडक्टर का काम करते हुए कैलाश चौधरी ने 1999 में वार्ड पार्षद का चुनाव लड़ा, लेकिन इस चुनाव में उनको हार मिली। कैलाश चौधरी का मनोबल टूट गया। उनके माता-पिता ने बेटे का मनोबल बढ़ाते हुए कहा कि हिम्मत न हारो, एक दिन मंत्री भी बन जाओगे। इसके बाद कैलाश चौधरी ने अपने क्षेत्र में काफी मेहनत की और क्षेत्र की समस्याओं के खिलाफ लड़ते रहे, जिसके कारण कैलाश चौधरी की छवि लड़ाका होने लगी।

इस तरह मेहनत करने के बाद कैलाश चौधरी साल 2004 में जिला परिषद के सदस्य के तौर पर निर्वाचित हुए। इस पद पर रहते हुए कैलाश चौधरी ने काफी मेहनत की और जनसेवा का काम किया। संघ परिवार से भी कैलाश चौधरी जुड़े हुए थे और उनकी विचारधारा को भी मानते थे।

बाढ़ पीड़ितों के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से कर ली लड़ाई

साल 2006 में एक ऐसा वाक्या हुआ, जिसने कैलाश चौधरी को राजनीति में आगे बढ़ाया। साल 2006 में कैलाश चौधरी ने कवास में बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत कार्य किया। उनकी समस्याओं को सरकार तक पहुचाने कैलाश चौधरी मुख्यमंत्री तक पहुंच गए। कैलाश चौधरी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को ज्ञापन सौंपते हुए झगड़ा कर लिया। इस वाकया के बाद कैलाश चौधरी का कद काफी बढ़ गया और वो युवाओ के चहेते बन गए।

राजनीतिक करियर-


साल 2008 में बायतु विधानसभा परिसीमन में आई। एस सीट पर कांग्रेस की ओर से कदावर नेता कर्नल सोनाराम चौधरी चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती थी कि बायतु से टिकट किसको दे? क्योंकि उनके सामने भाजपा की हार तय मानी जा रही थी। आखिरकार कैलाश चौधरी को भाजपा ने टिकट दी, लेकिन कैलाश चौधरी 31 हजार वोटों से चुनाव हार गए। अगले 5 सालों तक कैलाश चौधरी अपने विधानसभा क्षेत्र में काफी संघर्ष किया।

5 सालों तक अपने क्षेत्र के लोगों से जुड़े, उनकी समस्याओं को जाना, तो साल 2013 में कैलाश चौधरी को भाजपा ने फिर से मैदान में उतार दिया। इस बार भी उनके सामने कांग्रेस ने कर्नल सोनाराम चौधरी को उतार दिया। लेकिन इस बार कैलाश चौधरी ने सोनाराम चौधरी को मात दे दी। इस जीत पर किसी ने विश्वास ही नहीं किया था। इन 5 सालों में कैलाश चौधरी ने जनता से काफी जुड़ाव रखा, जनता के हित मे काम किये।

पिछले साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में जनता वसुंधरा से परेशान हो गई थी। इस बार भी इस सीट पर कैलाश चौधरी को भाजपा ने मैदान में उतार दिया। उनके सामने कांग्रेस ने हरीश चौधरी को मैदान में उतारा, क्योंकि 2014 में कर्नल सोनाराम बीजेपी में चले गए और सांसद बन गए। इस बार बायतु में हनुमान बेनीवाल की पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने भी चुनाव लड़ा। यह चुनाव त्रिकोणीय हो गया। इस चुनाव में हरीश चौधरी ने जीत दर्ज की थी, तो रालोपा दूसरे स्थान पर रही। वहीं कैलाश चौधरी तीसरे स्थान पर।

केंद्रीय मंत्री का सफर-

विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद कैलाश चौधरी ने पूरे बाड़मेर के दौरे किये, जनता से काफी जुड़ाव रखा। हार को हार न मानकर कैलाश चौधरी ने संघर्ष जारी रखा। अब लोकसभा चुनाव आ गए। भाजपा से यहाँ से सांसद कर्नल सोनाराम चौधरी थे ही, तो एक अधिकारी महेंद्र चौधरी ने भी इस बार लोकसभा चुनावों की पूरी तैयारी कर रखी थी। महेंद्र चौधरी ने सरकारी सेवा से रिटायर भी ले लिया। अंतिम समय तक इस सीट पर संयम बना रहा कि इस पर टिकट किसको मिलेगा?

इस बार कर्नल सोनाराम चौधरी की टिकट कटने की बातें हो रही थी, तो कैलाश चौधरी ने भी टिकट की दावेदारी कर दी। आखिरकार कैलाश चौधरी को टिकट मिल ही गई, उधर सोनाराम चौधरी नाराज हो गए।  कर्नल सोनाराम चौधरी के सामने कांग्रेस ने मानवेन्द्र सिंह को मैदान में उतारा।मानवेन्द्र सिंह और उनके पिता जसवंत सिंह भाजपा के ही थे, लेकिन नाराज होकर कांग्रेस में चले गए। 

इस सीट पर काफी कड़ा मुकाबला माना जा रहा था। इस सीट पर मानवेन्द्र सिंह को हराना मुश्किल था, लेकिन कैलाश चौधरी ने मानवेन्द्र सिंह को ऐसे हराया, जस पर किसी को विश्वास नहीं हुआ। कैलाश चौधरी ने 8 लाख के लगभग वोट प्राप्त किए तो मानवेन्द्र सिंह को 3 लाख से ज्यादा वोटों से हराया। अब कैलाश चौधरी सांसद तो बन गए।

बात आ गई मोदी के कैबिनेट की। कैलाश चौधरी का नाम बिल्कुल ही चर्चा में नहीं आया। मीडिया भी अन्य सांसदों के नामों पर चर्चा कर रहा था। लेकिन अचानक से कैलाश चौधरी का नाम मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हुआ, इस तरह नाम आने से सब चोंक गए। कैबिनेट के विभागों के हुए बंटवारे में कैलाश चौधरी को कृषि मंत्री और किसान कल्याण मंत्री बनाया गया। कैलाश चौधरी को यह मंत्रालय मिलने पर सबसे ज्यादा खुशी हुई, क्योंकि यह उनसे जुड़ा हुआ कार्यालय था। कैलाश चौधरी का कहना हैं कि 2022 तक हम किसानों की आय दुगुनी कर देंगें।

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