नागौर, राजस्थान।
राजस्थान प्रदेश के कई जिलों में मृत्यु भोज होता हैं। मृत्यु भोज मतलब किसी व्यक्ति के मरने के बाद सभी लोग उसके घर पर सामुहिक भोजन करते हैं। इस कुप्रथा को लोगों ने धार्मिक समझ कर लगातार चालू रखा हैं। हालांकि इस प्रथा का इतिहास कोई पुराना नहीं हैं, लेकिन यह कुप्रभाव ऐसी है कि लोगों के खेत खलियान तक इस मृत्यु भोज के कारण बिक गए। दरअसल राजस्थान के कई जिलों में बुजुर्ग व्यक्ति की मौत होने पर उस व्यक्ति की तेहरवीं यानी 12 वें दिन एक सामुहिक भोजन का आयोजन किया जाता हैं, पहले इस भोजन में आस-पास के गांव, सभी रिश्तेदार, गांव के लोग शामिल होते थे। हालांकि आजकल रिश्तेदार और गांव के लोग ही शामिल होते है। इस मृत्यु भोज में लाखों का खर्चा आता हैं।
जिस घर मे खाने-पाने का राशन नहीं हो और एन वक्त पर उस घर मे कोई बुजुर्ग गुजर जाए तो भी मृत्यु भोज करना पड़ता हैं, ऐसे में उस परिवार को मजबूरन अपना खेत, जमीन बेचकर मृत्यु भोज करना पड़ता हैं। हालांकि खाने वाले लोगों के लिए यह एक दिन का भोजन होता हैं, लेकिन जो व्यक्ति इसका आयोजन करता हैं, उसकी पूरी जिंदगी इस कर्जे को चुकाने में गुजर जाती हैं और जो यह मृत्यु भोज नहीं करे, उसे समाज मे स्थान नहीं मिलेगा, खुद के समाज के लोग ही बुरी नजरो से देखते हैं। आखिरकार शायद आप समझ गए होंगें कि मृत्यु भोज किस तरह की कुप्रथा हैं।
कोरोना के कारण मृत्यु भोज बन्द हुआ
दरअसल फिलहाल लॉक डाउन के कारण इस कुप्रथा पर रोक लग गई हैं, इस मामले में कोरोना एक अच्छी मिसाल भी साबित हुआ है। हालांकि सामान्य लोगों की मृत्यु में कोई गिरावट नहीं आई, लेकिन मृत्यु भोज अभी बन्द हो गया, लेकिन लोगों का कहना हैं कि जब लॉक डाउन खुल जायेगा तो उसके बाद यह मृत्यु भोज कर सकते हैं। मतलब आओ समझ सकते हैं कि यह सिर्फ और सिर्फ एक दिन का खाना ही हैं। राजस्थान में जाट समाज में काफी हद तक मृत्यु भोज का आयोजन किया जाता हैं।
क्यों न मृत्यु भोज हमेशा के लिए बन्द हो जाए-
फिलहाल कोरोना इस कुरुति को रोकने के लिए सबसे अच्छा मौका हैं। अभी मृत्यु भोज रुके हुए और इन्हें रुके हुए ही रखना चाहिए। रोकने के लिए सभी गांवों को एक सामुहिक निर्णय लेना होगा क्योंकि एक आदमी इस कुप्रथा को नहीं रोक सकता। ग्रामीण स्तर, तहसील स्तर पर इस प्रथा को रोकना होगा। हालांकि युवा लोग सोशल मीडिया पर इस को रोकने के लिए चर्चा भी कर रहे है। युवा लोगों को बुजुर्गों और गांव के सम्मानित लोगों को समझाकर इस प्रथा को रोकने के लिए सामुहिक निर्णय लेना चाहिए।
आखिर मृत्यु भोज शुरू ही क्यों हुआ???
दरअसल कई लोगों का मानना हैं कि मृत्यु भोज एक धार्मिक प्रथा हैं, लेकिन ऐसा नहीं हैं। मृत्यु भोज शूरू करने का एक ही कारण था। किसी बुजुर्ग के मर जाने पर उनके रिश्तेदार दूर दराज से शोक प्रकट करने आते थे, वो काफी दूर से आते थे और उनको 1-2 दिन का समय लग जाता था, क्योंकि इस समय मे लोग पैदल ही आते थे या फिर ऊँट जैसे साधनों पर। इसलिए उन लोगों के लिए वहां खाने की व्यवस्था की जाती थी। शुरुआत में यह खाने की व्यवस्था पड़ोसी लोग करते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह काम जिस घर मे मौत हुई उसी में होना शुरू हो गया। पहले उस घर मे खाना दूर दराज वाले लोग ही खाते थे, बाद में धीरे-धीरे सभी ने खाना शुरू कर दिया। इस प्रकार यह एक बड़ी कुप्रथा बन गई।
आज के समय में यह स्थिति नहीं हैं। आज एक दिन में आदमी 1000 किलोमीटर तक सफर कर सकता हैं, इस तरह के साधन हैं। आज के समय में जो लोग दूर से आते हैं, वो गाड़ी, बस की सहायता से3 आते और 1-2 घण्टे में पहुंच जाते हैं, इसलिए उनके लिए भी खाने की व्यवस्था की कोई जरूरत नहीं हैं। ऐसे में मृत्यु भोज का कोई औचित्य नहीं रह जाता हैं। आखिर में INC News यही निवेदन करता हैं कि इस कुप्रथा को अब खत्म कर देना चाहिए।


Tnxx for comment